श्वयुवमघोनामतद्धिते ।६।४।१३३।। (samprasāraṇaa of aṅga śvan, yuvan, maghavan when a non-taddhita affix follows)

अन्नन्तानां भसञ्ज्ञकानाम् एषाम् अतद्धिते परे सम्प्रसारणं स्यात्। मघोनः। मघवभ्याम्। एवं श्वन्, युवन् ।।
अर्थात्

‘अन्’ शब्द जिन के अन्त में हैं ऐसे भसञ्ज्ञक श्वन्, युवन्, मघवन् शब्दों का तद्धितभिन्न प्रत्यय परे होने पर सम्प्रसारण जो जाता है।
इमं सूत्रमन्तरेण एकं सुभाषितमत्यन्तप्रसिद्धमस्ति ।

काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे
ग्रथ्नासि बाले! किमिदं विचित्रम् ?
विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे
श्वानं युवानं मघवानमाह ।।

अर्थात् ,

माला गूंथती हुई किसी लड़की से प्रश्न किया गया कि तुम कांच, मणि और सोने को एक ही सूत्र (तागे) में क्यों गूंथ रही हो? वह उत्तर देती है – विचारवान् पाणिनिमुनि ने भी तो एक सूत्र में कुत्ते, युवा और इन्द्र को घसीट मारा है ।  कहने का अर्थ यह है कि जब पाणिनि जैसे बुद्धिमान लोग भी असमान वस्तुओं को एक स्थान में बिठाते हैं तो भला मैं बाला (मूर्खा) ऐसा करूँ तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?

 

 

२०१६-१०-१७ सोमवासरः (2016-10-17 Monday)