स्रंसु अवस्रंसने (to fall, to slip)

स्रंसु अवस्रंसने (गिरना, खिसकना, अधःपतन होना) भ्वादिगणीय, अकर्मक, सेट्, आत्मनेपदीय धातुः।

स्रंसते स्रंसेते स्रंसन्ते इति लट्लकारे रूपाणि।

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्  (भगवद्गीतायां १।३०)  – गाण्डीव हाथ से फिसलता है

शुभं पुनर्हेमसमानवर्णमीषद्रजोध्वस्तमिवामलाक्ष्याः ।  वासः स्थितायाः शिखराग्रदत्याः किंचित् परिस्रंसत चारुगात्र्याः ।। (वाल्मीकीये रामायणे सुन्दरकाण्डे  २९।५।)

अन्वय: – पुनः अमलाक्ष्याः  शिखराग्रदत्याः  चारुगात्र्याः स्थितायाः  शुभं हेमसमानवर्णं   ईषद् रजोध्वस्तमिव  वासः किंचित् परिस्रंसत   ।

भाषार्थ: – फिर निरुपम आँखोंवाली अनार के दाने जैसी दन्तपंक्तिवाली सुन्दर अंगोंवाली सीताजी जैसे खड़ी हुयीं उनका चंपई रंग की ओढ़नी जो कुछ कुछ मैली सी हो गयी थी थोड़ी सी खिसक पड़ी

परिस्रंसत अथवा पर्यस्रंसत इति लङ्लकारे रूपम् । अडभावश्च आर्षः इति व्याख्याकारः ।

कृत्वा श्यामाविटपसदृशं स्रस्तमुक्तं द्वितीयम् (मालविकाग्निमित्रे द्वितीयाङ्के षष्ठे श्लोके)

भाषार्थः – दूसरा (हाथ) श्यामा की डाली के समान ढीला लटका हुआ है

२०१६-१०-०१ शनिवासरः (2016-10-01 Saturday)